ब्रजेश पोरवाल-एडीटर &चीफ टाइम्स ऑफ आर्यावर्त 7017774931
इटावा, प्रदर्शनी पंडाल में शुक्रवार की शाम हुए स्थानीय कवि सम्मेलन में कवियों ने ओज, श्रृंगार, करुण, हास्य व्यंग्य आदि रसों से ओतप्रोत रचनाओं को सुनाकर श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। पूर्व राज्यमंत्री अशोक यादव ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर दो कवियों, एक वरिष्ठ गोविंद माधव शुक्ला एवं एक युवा कवि रोहित चौधरी का परम्परागत रूप से शॉल ओढ़ाकर तथा सभी अतिथियों एवं कवियों का का स्वागत सम्मेलन के संयोजक पं. विश्वंभरनाथ भटेले एवं सह संयोजक सुरेश चंद्र दुबे ने किया। प्रथम सत्र का संचालन डॉ.सुशील सम्राट ने तथा दूसरे सत्र का संचालन सुधीर मिश्र ने किया। जनपद के वरिष्ठ कवि दीपचंद्र त्रिपाठी “निर्बल” ने मां वाग्देवी की वंदना के साथ की, “मात वीणापणि करुणा कीजिए। दास निर्बल की विनय सुन लीजिए”। अवधेश “भ्रमर” ने ललकारते हुए कहा, ” वचन मीठे किंतु गंदे आचरण हैं, और चेहरे पर बहुत से आवरण हैं। मर्म से कुछ कर्म से कुछ नाम से कुछ, आज वे ही जिंदगी के व्याकरण हैं”। अरविंद योगी ने सुनाया, “जब जब बाट किसी ने हेरी तब तब हमने गीत लिखे। मूर्तिकार ने मूर्ति उकेरी तब तब हमने गीत लिखे”। गोविंद माधव शुक्ला ने रचना पढ़ी, “घाव कैसा भी हो एक रोज तो भर ही जाता है। ये अलग बात है कि निशां जाते जाते जाता है”। ओज के सशक्त हस्ताक्षर रोहित चौधरी ने गरजते हुए कहा कि “मैं भूषण की सिंह गर्जना खुद की ताकत रखता हूं। वंदे मातरम होठों पर दिल में भारत रखता हूं”। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि गजलकार अशोक यादव ने अपनी रचनाओं से समा बांधा, “दिल की बात जुबां पर लना कितना मुश्किल होता है। किसी को उसका सच बतलाना कितना मुश्किल होता है”। महिला कवयित्री डॉ. मंजू यादव ने ग़ज़ल सुनाई, “दैरो हरम में क्यों मुझे उलझा रहे हो तुम। नफ़रत के बीज हर जगह बिखरा रहे हो तुम”। भरथना से ये वरिष्ठ कवि अनिल दीक्षित ने मुक्तक पढ़ा, “किसी किसी के खजाने के लिए होती है, कहीं टेबल पे सजाने के लिए होती है। हमसे पूछोगे तो हम ये ही कहेंगे यारो, रोटियां भूख मिटाने के लिए होती है। कवि सम्मेलन का संचालन कर रहे सुधीर मिश्र ने रचना सुनाई, “दर्द की जमीन हो गई। जिंदगी मशीन हो गई”। शिव गोपाल अवस्थी की ये रचना भी खूब सराही गई, “बुजुर्गों की जमीनें बेचकर धनवान मत होना, पलायन करके अपने गांव की पहचान मत खोना”। सुनील अवस्थी ने चोट करते हुए कहा, “काश तुम्हारी हर हरकत पर तुरत तमाचा मारा होता। तो भारत की अबलाओं की चूड़ियां छिनती नहीं”। महेश मंगल ने पढ़ा, “इस अली में नहीं उस बली में नहीं, हम किसी कीर्तन मंडली में नहीं”। प्रमोद तिवारी हंस ने सुनाया, “तुम मिले तो सही पर मिले ही नहीं, पुष्प मन के तुम्हारे खिले ही नहीं”। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजानंद शर्मा ने की। इसके अलावा देवेश शास्त्री, आलोक भदौरिया अर्श, कमलेश वर्मा, प्रेम नारायण त्रिपाठी प्रेम, रजनीश त्रिपाठी, प्रतिमा चतुर्वेदी, सत्यनारायण शर्मा, अवनीश त्रिपाठी, प्रशांत तिवारी, हर्ष शर्मा, सुरेश चंद्र दुबे, राजवीर माथुर, सुमित कुमार, निहारिका ने भी बढ़िया काव्यपाठ किया। अंत में संयोजक विश्वंभरनाथ भटेले ने कवि सम्मेलन को सफल बनाने के लिए सभी का आभार जताया।
